Babaji's Kriya Yoga
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संपादकीय : “संसार में इतना दुःख क्यों है ?

लेखक : मार्शल गोविन्दन सत्चिदानन्द


दक्षिणी एशिया के कई देशों मे सुनामी से हाल मे आई इतनी बड़ी तबाही के हृदयविदारक समाचार एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि ”संसार में इतना कष्ट क्यों है ?” इतने बड़े पैमाने पर विपत्ति का आना कोई नई बात नहीं है | प्राकृतिक आपदा, युद्ध, महामारी और दुष्टता हमेशा से ही रहे हैं | नई बात यह है की आज हम अपने घर बैठे ही दुनिया के किसी भी कोने में इंसानों पर आये हुए संकट को टीवी पर देख सकते हैं | और कुछ करें ना करें कम से कम हम इस प्रश्न पर ध्यान दे कर इसका उत्तर ढूँढने की कोशिश कर सकते हैं | योग सूत्र के महान व्याख्याकार स्वामी हरिहरानन्द अरण्य ने कहा है “यदि ज्ञान का उद्देश्य मानवता का कष्ट निवारण है तो सर्वोच्च ज्ञान वही है जो दुःख से पूर्ण मुक्ति दे” | सारी दुनिया की छोटी बड़ी खबर जानने में अपना कीमती समय गंवाने की जगह आइये आज हम प्रार्थना करें कि हमें इस “क्यों” का उत्तर मिले |

दुःख के कारण और उनके निदान के ऊपर योग में विस्तृत चर्चा की गई है | आर्थिक विकास, कानून, चिकित्सा और औपचारिक शिक्षा जैसे आधुनिक उपाय ढूँढने की जगह पतंजलि और तिरुमूलर जैसे सिद्ध योगियों ने मानवता के दुर्गति के मूल कारण को पहचाना और उन कारणों के निवारण के उपाय बताये | उनकी शिक्षा आज भी उपयुक्त है जितने की 2000 साल पहले थी क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्तियाँ आज भी वैसी ही हैं | और इसीलिए हमारे जैसे योग साधकों का कर्त्तव्य है कि हम इस शिक्षा का अध्ययन करें और दुःख-क्लेश से ग्रस्त मानव समाज तक इसे पहुँचायें |

क्लेश

योग सूत्र के द्वितीय पाद में पतंजलि ने हमें बतलाया है :

“अविद्या, अस्मिता,राग,द्वेष और अभिनिवेश – ये पाँच क्लेश हैं” II. 3

दुःख का मूल कारण है अविद्या और यही अन्य क्लेशों का श्रोत है | यहाँ पर अविद्या से सामान्य अज्ञान या विद्या का अभाव नहीं बल्कि अपनी सही पहचान से वंचित रहना है | चेतना के विषयों को “अस्ति भाव” से जोड़ने का भ्रम इसी कारण से उत्पन्न होता है | यह अपनी वास्तविकता को भूलकर स्वयं को “शरीर, मन, इन्द्रिय, भावना,” इत्यादि समझने की भूल करता है | सामान्य मनुष्य में यह पञ्च-क्लेश लगातार ज्यूँ का त्यूं बने रहते हैं | जब भी हमारी जान माल पर संकट आता है तो हमारी सोच समझ पर भय हावी हो जाता है | इसके आगे पतंजलि हमें बतलाते हैं :

“नश्वर को शाश्वत, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख् और अनात्मा को आत्मा समझ लेना ही अविद्या है” – II.5

अपने वास्तविकता को न पहचान पाने के कारण ही हम बोल बैठते हैं “मैं थक गया हूँ”, “मैं परेशान हूँ”, “मैं गुस्से में हूँ” | जबकि सच्चाई ये है कि “मेरा शरीर थक गया है” अथवा “मेरा मन चिंताग्रस्त है” | अपना वास्तविक परिचय या अपनी आत्मा को न जान पाना ही मानवता के दुखों का मूल कारण है | आत्मा चिरस्थायी शाक्षी है | आत्मा अपरिवर्तनशील है, यही अनन्त आत्मा नाना रूपों में गतिशील होते हुए भी शुद्ध और निर्लिप्त द्रष्टा है जो सब में व्याप्त है | बाकी सब कुछ अस्थायी और परिवर्तनशील है | अगर हम अनित्य से चिपके रहेंगे तो दुःख को तो आना ही है | और ऐसा नहीं है कि दुःख कुछ खोने या किसी से बिछड़ने के बाद ही आता है बल्कि दुःख अपने आसक्ति के विषयों को खो देने के डर से ही शुरू हो जाता है | जो सर्वव्यापी आत्मा का दर्शन पा लेता है वह हजारों उथल पुथल के बीच एक नीरव आश्रय और आत्मज्ञान पा लेता है |

“देखने के यंत्र को देखने वाला समझ बैठना अस्मिता है” – II.6

अपने शरीर, मन, भावनाओं और संवेदनाओं को अपना स्वरुप मान लेने की आदत अस्मिता है | अपनी वास्तविकता का ज्ञान न होने के कारण ही यह भ्रम उत्पन्न होता है | ऐसा नहीं है कि यह किसी एक व्यक्ति की कमजोरी हो बल्कि मानव मात्र में व्याप्त भ्रान्ति है या यूँ कहें कि चेतना को गुप्त रखने के लिये इसका सृजन किया गया है | सर्वव्यापी चेतना को प्रत्येक प्राणी में पृथक रचने का इस प्राकृतिक नियम का योगी विवेक और वैराग्य के अभ्यास से अतिक्रमण कर अपनी चेतना को पुनः विस्तृत कर सकता है | “मैं दुखी हूँ” के सोचने के जगह अपने दुःख को साक्षी भाव से देखते हुए इस दुःख के निवारण अथवा सुख् के प्राप्ति के लिये आवश्यक कर्म करते रहें |

“सुख् के प्रति आसक्ति राग है” -II.7

सर्वव्यापी चेतना से पृथक व्यक्ति जब स्वयं को शरीर, विचार प्रवाह एवं स्मृति समझ लेता है तो वह अपने परिवेश में उपलब्ध सुखद अनुभूतियों पर आसक्त हो जाता है | अपने आतंरिक आनन्द के अनुभूति को बाहरी उपादानों तथा परिस्थितियों से जोड़ लेने के कारण उनके छूट जाने कि कल्पना से उत्पन्न भय राग है | हम ऐसी कल्पना कर लेते हैं कि सुख् बाहरी परिस्थितियों और उपादानों पर निर्भर है | तब इनके न होने से हमें लगता है कि अपना आंतरिक सुख् उन्ही परिस्थितियों अथवा उपादानों के वापस आने पर ही हासिल होगा | यही राग है | राग आसक्ति और दुःख दोनों ही से बना है | सच तो ये है कि आनंद की अनुभूति स्व-स्फूर्त है, स्वाधीन है और यह बाह्य परिस्थिति अथवा उपादानों पर निर्भर नहीं है | इसके प्रति सजग रहने मात्र से ही इसका अनुभव प्राप्त हो जाता है | राग को तिलांजलि देते रहना है |

“दुःख से चिपके रहना द्वेष है” II-8

ठीक उसी तरह कभी ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जिनसे हम वितृष्णा की अनुभूति करते हैं | एक ही परिस्थिति में अलग अलग व्यक्ति की अलग प्रतिक्रिया होती है | जो एक को सुख् देता है वही दूसरे के लिये दुखदायी हो सकता है | सुख् और दुःख के इस द्वंद्व से परे जाकर प्रत्येक परिस्थिति में समभाव या वैराग्य का अभ्यास पतंजलि के अनुसार श्रेष्ठ है | बाह्य परिस्थितियों को तत्काल बदल डालना अक्सर संभव नहीं होता | द्वेष से मुक्त होने के लिये हमें पहले अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर अपनी चेतना के गहराई में उतरना होगा | और उसके बाद ही हम अनुकूल वातावरण बनाने के लिये आवश्यक परिवर्तन ला सकेंगे | जो भी काम मिले उसे राग और द्वेष से रिक्त होने की प्रशिक्षण मान कर एक कर्म योगी की भावना से करें | कर्ता भाव को त्याग कर सभी कार्य धैर्यपूर्वक, निपुणता और निःस्वार्थ भाव से करें | कार्य और कार्य के फल दोनों के प्रति समभाव बनाये रखें |.

"“अभिनिवेश अर्थात जीवित रहने की लालसा बुद्धिमानों के मन में भी उपजती है जबकि जीवन स्व-स्फूर्त है” II-9

प्रत्येक प्राणी में आत्म-संरक्षण की प्रवृत्ति स्वतः विद्यमान है | यह स्वयं को मात्र शरीर समझ लेने की भ्रान्ति और मृत्यु के भय पर आधारित है | हम सब ने कई जन्मों से जन्म और मृत्यु की पीड़ा इतनी बार झेली है कि इसकी पुनरावृत्ति से घबराते हैं | अपने जान के ऊपर कोई खतरा देखते ही हम काँप उठते हैं | घबराहट से हमारी धड़कन तेज हो जाती और मारे डर के हम चीख पड़ते हैं | मगर जब हम अपने सच्चे स्वरुप का गहराई से मनन कर के अपने अविनाशी आत्मा का ध्यान करते हैं तब हम इन सभी क्लेशों से मुक्त हो जाते हैं

"“सूक्ष्म रूप में विद्यमान इन क्लेशों का नाश उनके उत्पत्ति के कारणों की जड़ की पहचान कर लेने से होता है” II-10

पञ्चक्लेश अवचेतन के सूक्ष्म स्तर पर धारण किये हुए संस्कार हैं | समाधि की विभिन्न स्थितियों में अपने स्त्रोत में बारम्बार अवस्थित होकर इन्हें मिटाया जा सकता है | अवचेतन में छिपे हुए ये संस्कार सामान्य सजगता की स्थिति में और यहाँ तक कि ध्यान की स्थिति में भी पकड़ में नहीँ आते हैं | अतः इनके निवारण के लिये यह जरूरी है कि अपने सच्चे स्वरुप की पहचान निरंतर बनाये रखकर अस्मिता का जड़ से उन्मूलन किया जाये | जब “मैं” अपने सीमित परिचय से बढ़ता हुआ अपने विराट रूप को पहचानने लगता है तब इस आत्म-साक्षात्कार के साथ संस्कार विलुप्त हो जाते हैं | सूत्र I.12 में पतंजलि कहते हैं कि सतत अभ्यास एवं वैराग्य से चित्त की वृत्तियों को “मैं” समझ लेने की भ्रान्ति अस्त होती है

“क्रियावान स्थिति में चित्त में उठती हुई वृत्तियों का ध्यान के द्वारा नाश होता है” II-11

तात्पर्य यह है कि ध्यान से ही समाधि की प्राप्ति संभव है और तभी मन की साधारण गतिविधियों में उलझे रहने की आदत से निपटा जा सकता है

कर्म एवं आकस्मिक आपदाएँ

जब भी कोई आकस्मिक आपदा टूटती है जैसा कि दक्षिणी एशिया में आई सुनामी, हमारे मन में ये सवाल उठता है “इतने लोगों को क्यों मारना पड़ा ?” “और बाकी के बच क्यों गए ?” या भुक्तभोगी के मन में उठता हुआ सवाल “मेरे ही साथ क्यों ?” “मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था ?” “मेरा क्या दोष था ?” पतंजलि तथा अन्य सिद्धों ने कर्म के विधान के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक बताया है | कर्म के विधान के अनुसार अतीत के हमारे कार्य, वचन और विचार फलित होते हैं | पञ्चक्लेशों के कारण हम कर्म संचय करते जाते हैं | यह 3 प्रकार से होता है :

1. प्रारब्ध कर्म : पूर्व जन्म के कर्म जिन्हें काटने के लिये यह जन्म हुआ;
2. अगम कर्म : इस जन्म मे सृजित कर्म;
3. संचित कर्म : जो आने वाले जन्मों में फलित होंगे.

कर्म का धारण कर्माशय में होता है | यही कर्म की कोख अथवा भण्डार है | यहीं सारे कर्म एकत्रित हैं | कर्म सतह पर आकर क्लेशों के रूप में प्रकट होने की प्रतीक्षा में रहते हैं | ऐसा भी हो सकता है कि किसी एक प्रबल कर्म को काटने के लिये ही एक जन्म लेकर शरीर धारण करना परे | उस प्रबल कर्म से सम्बंधित कर्मों का भी फलभोग इसी जन्म में हो जाता है | यह तब तक चलता रहता है जब तक आत्म-ज्ञान की प्राप्ति कर व्यक्ति नए कर्म संचय करना बंद ना कर दे |

ये सच है कि व्यक्ति अपने कर्मों से जुड़ा हुआ है और कर्म ही निर्धारित करता है कि वह कैसे जीता है और विभिन्न परिस्थितियों में उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी किन्तु वह पूरी तरह विवश भी नहीं है | उसे इस बात की स्वतंत्रता है की कर्मजन्य परिस्थितियों से उसका बर्ताव सकारात्मक हो या नकारात्मक | अगर हमारा व्यवहार नकारात्मक होता है जिससे हम दूसरों को दुःख पहुंचाते हैं तो वही दुःख और भी विकराल रूप धर कर हमारे जीवन में लौटती हैं | जब हम परिस्थितियों का सामना सजगता एवं धैर्यपूर्वक करते हुए लोकोपकार करते रहें तब वो कर्म क्षीण पड़ने लगते हैं |

हमारे एक साधक के पुत्र असंक वित्ताची जो श्री लंका में शरणार्थियों की सेवा से युक्त हैं, अपने हाल की एक रिपोर्ट में कहते हैं :

“एक ही दोपहर की दो घटनाओं ने मुझे मनुष्य के निकृष्ट और उत्कृष्ट दोनों ही गुणों का परिचय करवा दिया | राहत के लिये बांटने को हमारे पास जो थोड़ा बहुत था उसे बांटने के क्रम में मैंने एक ओर तो ये देखा की शरणार्थियों के ऊपर भी लूट-खसोट, ठगी, बेईमानी कर उनके पास जो भी बचा खुचा था वो छीना जा रहा था यहाँ तक की राहत सामग्री पहुँचाने वाली गाड़ी को भी लूटा जा रहा था और दूसरी ओर एक ऐसा इंसान भी दिखा जिसने विकट परिस्थिति में भी उदारता दिखाई |

अपने मकान के खंडहर पर वह अकेला खड़ा था | अपने पास से खाना का एक पैकेट देने के लिये मैंने उसे पुकारा | उसने अवसाद और कृतज्ञता भरी आँखें मेरी आँखों में डाल कर मुझे बताया कि वह नाश्ते में एक पावरोटी खा चुका था | उसकी इच्छा थी कि खाना का पैकेट उन्हें मिले जो सुबह से भूखे थे” |

दुःख का सामना कैसे करें

मनन करने का विषय यही है कि इस तरह की आपदाओं से हम क्या सीखते हैं और उसके आने से हम कैसा आचार-व्यवहार करते हैं | पतंजलि कहते हैं :

“उन्मूलन उस दुःख का करना है जो अनागत है” II-16 केवल आत्मा के चिंतन से ही हम उस दुःख से पार पा सकते हैं जो अभी आया नहीं है और जिसकी आगमन का श्रोत कर्मकोष में है | क्योंकि “दृश्यमान का अस्तित्व केवल आत्मा के लिये है” (II.21) और “दृश्यमान जगत भोग और मुक्ति दोनों ही प्रदान करने वाला है” (II-18) प्रकृति नाना प्रकार के भोग दिला कर अन्ततः हमारी चेतना को अपने मिथ्या परिचय से मुक्त करती है | अंततोगत्वा हम यह महसूस करते हैं कि प्रकृति के हाथों बहुत दुःख झेल लिये और तब अपने आत्मवादी भ्रांतियों(“मैं शरीर, मन, इत्यादि हूँ”) से निकलने के उपाय ढूँढने लगते हैं | सीधी बात ये है कि, प्रत्येक अनुभव से हमें कुछ सीखने का मौका मिलता है और हमें इनसे सत्य असत्य, ज्ञान अज्ञान, शाश्वत नश्वर, प्रेम आसक्ति, आत्मा शरीर-मन-अहंकार तथा दृश्य द्रष्टा के भेद को समझने का विवेक मिलता है | अपनी आत्मा को भूलने की प्रवृत्ति का अद्भुत उपचार है योग | अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान पा लेने के बाद जब हम दूसरों को दुःख उठाते देखते हैं तो उनके प्रति करुणा का अनुभव करते हैं | ऐसी परिस्थिति से भयभीत होने की जगह जब हम अपने विचार और कर्म से उनकी सेवा करें तो हमारे मन और भावनाओं की शुद्धि होती है और शांति आती है | सद्भाव से परिशुद्ध मन ईश्वरीय शक्ति से प्रेरित होकर सर्वजनहिताय प्रयत्नशील होता है |

मानवता के दुःख और कष्ट का सामना हम अपने विचार, वचन और कर्म में करुणा जगा कर करें | हमारा हृदय प्रेम और दया से परिपूर्ण हो |

Copyright: M. Govindan Satchidananda, January 2005

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